उत्तराखण्ड हाइकोर्ट का 31 मार्च को विधानसभा में शक्ति परीक्षण का आदेश

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की दो सदस्यों वाली खण्डपीठ ने राज्य में राष्ट्रपति शासन के आदेश को निरस्त कर दिया।

 

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की याचिका पर उन्हें 31 मार्च को राज्य विधानसभा में बहुमत साबित करने को आदेश दिया है।

इस आदेश को केंद्र सरकार के लिये झटका माना जा रहा है। क्योंकि राज्य में भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी उठा-पटक की वजह से केंद्र ने 27 फरवरी को उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को राहत तो जरूर मिली है लेकिन उनकी मुश्किलें भी बढ़ गयी हैं क्योंकि उच्च न्यायालय ने कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को भी वोटिंग का अधिकार दे दिया।

ये बागी विधायक अलग से कोर्ट के पर्यवेक्षक की निगरानी में वोट करेंगे।

उत्तराखण्ड के स्थानीय मीडिया के मुताबिक न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की बेंच ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं की।

यह पहली बार है, जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान फ्लोर टेस्ट हो सकता है। विधानसभा में हाईकोर्ट पर्यवेक्षक भी मौजूद रहेगा।

शनिवार को कांग्रेस के बागी विधायकों मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक कथित स्टिंग आपरेशन की सीडी जारी की थी। विधायकों ने दावा किया कि मुख्यमंत्री सरकार बचाने के लिये खुद खरीद-फरोख्त कर रहे थे।

26 मार्च को कांग्रेस के बागी विधायकों मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक कथित स्टिंग आपरेशन की सीडी जारी की थी। विधायकों ने दावा किया कि मुख्यमंत्री सरकार बचाने के लिये खुद खरीद-फरोख्त कर रहे थे। इसी के बाद केंद्र ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की संस्तुति की थी।

हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को शक्ति परीक्षण के दौरान विधानसभा में कड़े सुरक्षा इंतजाम के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां संतुष्ट नहीं दिख रही हैं।

रावत के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने स्थानीय मीडिया से बातचीत में कहा कि न्यायालय ने कांग्रेस की दलील को स्वीकार किया है।

सिंघवी की दलील थी कि विधायकों की खरीद-फरोख्त के महज आरोप ही, राष्ट्रपति शासन लागू करने और फ्लोर टेस्ट रोकने का पर्याप्त आधार नहीं है।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि राष्ट्रपति के आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता। राज्य में संवैधानिक व्यवस्था नाकाम रही थी। ऐसे में राष्ट्रपति शासन लगाने के पर्याप्त आधार हैं।

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