झारखण्ड में त्रिशंकु विधानसभा, सत्ता के लिये जोड़ तोड़ तेज
मेरी सरकार न्यूज़ सर्विस
नई दिल्ली, दिसंबर 23, 2009
लंबे राजनीतिक गतिरोध और एक महीने लंबी चली चुनावी प्रक्रिया के बावजूद झारखण्ड की राजनीतिक अस्थिरता के पूरे तौर पर समाप्त होने के आसार नहीं दिख रहे हैं क्योंकि मतदाताओं का जनादेश खण्डित है. हालांकि विधायकों की संख्या के मामले में तीसरे स्थान पर होने के बावजूद झारखण्ड मुक्ति मोर्चे के अध्यक्ष शिबू सोरेन इस दौड़ में आगे दिख रहे हैं.
कांग्रेस और बाबूलाल मराण्डी की पार्टी झारखण्ड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का चुनाव पूर्व गठबंधन 25 सीटों के साथ सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरा है और 20 सीटों के साथ भाजपा जनता दल (यू) का गठबंधन दूसरे नंबर पर है. लेकिन स्पष्ट जनादेश नहीं होने की वजह से झारखण्ड मुक्ति मोर्चे के 18 विधायकों के किसी की भी सरकार बनना मुश्किल है.
81 सीटों वाली इस विधानसभा में सरकार बनाने के लिये कम से कम 41 विधायकों का समर्थन चाहिये यही वजह है कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही शिबू सोरेन की जरूरत बनेगी. शिबू सोरेन भी रांची छोड़कर बोकारो चले गये हैं और उन्होंने किसी को भी न नहीं कहा है.
उनके समर्थक पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि उनकी पार्टी उसी को समर्थन देगी जो गठबंधन शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने का वचन देगा.
हालांकि इस जोड़-तोड़ में राष्ट्रीय जनता दल की भी भूमिका होगी क्योंकि उसके गठबंधन के पास 5 विधायक हैं और निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के पास 13 और विधायक हैं. साफ है कि दोनों को मिलाकर उतने ही विधायक हो जाते हैं जितने शिबू सोरेन के झामुमों के पास हैं.
ये 18 विधायक भी भाजपा को मिल जायें तो उसकी सरकार बनती नहीं दिखती है. एक संभावना जरूर है कि पूर्व भाजपा सदस्य और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके बाबूलाल मराण्डी यदि कांग्रेस के पाले से छिटककर भाजपा-जनता दल से हाथ मिलाने को तैयार हो जायें तो सत्ता के खेल में नये समीकरण बन सकते हैं.