तमिलनाडु और कर्नाटक 50% से ज्यादा आरक्षण को अनुमति देने वाले कानूनों पर पुनर्विचार करें: सर्वोच्च न्यायालय
मेरी सरकार न्यूज़ सर्विस
नई दिल्ली, जुलाई 13, 2010
50% से ज्यादा आरक्षण वाले कानूनों पर पुनर्विचार करें राज्य
एक महत्वपूर्ण निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों से कहा है कि वे अपने राज्यों में पारित ऐसे कानूनों पर दोबारा विचार करें जिनसे 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण को वैधानिकता मिलती है. इन दोनों राज्यों में सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देने के कानून हैं.
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने हालांकि अपने उस अंतरिम आदेश को एक और साल के लिये बढ़ा दिया है जिसके अन्तर्गत तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी गयी थी जबकि मण्डल आयोग की सिफारिशों के अनुसार कर्नाटक को पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देने से रोक दिया गया था.
मुख्य न्यायाधीश एस. एच. कपाड़िया, न्यायाधीश के. एस. राधाकृष्णन और न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने दो अलग समूहों में रखी गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुये अलग-अलग आदेशों में ऐसा कहा.
हालांकि न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि वे इन कानूनों की वैधानिकता पर कोई विचार नहीं व्यक्त कर रहे हैं.
पहले समूह की याचिकाओं में तमिलनाडु कानून, 1993 को चुनौती दी गयी थी जिसमें 69 प्रतिशत आरक्षण देने को अनुमति दी गयी थी. जबकि दूसरी याचिकाओं में कर्नाटक कानून 1994 को चुनौती दी गयी थी जिसके तहत 73 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है.
तमिलनाडु के आरक्षण संबंधी कानूनों पर विचार करते हुये न्यायपीठ ने कहा कि सरकार राज्य पिछड़ा आयोग को जातियों की संख्या संबंधी सभी आंकड़े उपलब्ध करायेगी जो इस विषय पर पुनर्विचार करेगा.
न्यायपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 69 प्रतिशत आरक्षण को अनुमति देने वाला न्यायालय का अंतरिम आदेश एक और वर्ष के लिये जारी रहेगा.
जबकि कर्नाटक को न्यायालय ने 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देने से रोकने का आदेश दिया था. न्यायालय ने कर्नाटक से कहा कि यदि वह आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाना चाहता है तो उसे ताजा आंकड़ो की रोशनी में अपने कानूनों पर एक बार फिर से विचार करना चाहिये.