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महिलाओं को संरक्षक बनने और बच्चे गोद लेने-देने के मामले में समान क़ानूनी अधिकार मिले
मेरी सरकार न्यूज़ सर्विस
नई दिल्ली, अगस्त 20, 2010
 
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महिलाओं को गोद लेने और संरक्षक बनने के लिये पुरुषों के बराबर अधिकार मिले
जानकारों की दृष्टि में भारतीय समाज और कॉनूनों में लिंग के आधार पर बने हुये पक्षपात को समाप्त करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है. लोकसभा ने शुक्रवार को कानून में उस बदलाव को अपनी अनुमति दे दी जिसके अन्तर्गत महिलाओं को अब बच्चों के संरक्षक बनने और गोद लेने या देने के निर्णयों में पुरुषों के समान अधिकार मिल गये हैं.

लोकसभा ने इसके लिये निजी क़ानून में आवश्यक परिवर्तन को मंजूरी दे दी है जबकि राज्यसभा मंगलवार को ही इसको अपनी मंजूरी दे चुकी थी.

क़ानून में इस बदलाव के बाद माता को भी पिता के साथ बच्चों का संरक्षक माना जायेगा ताकि किसी आवश्यकता के समय अवयस्क बच्चों की संरक्षा के लिये न्यायालय दोनों जनकों में से किसी भी एक को बच्चे का संरक्षक नियुक्त कर सके.

मौजूदा कानूनों के तहत हिंदू परिवार में पिता को ही गोद लेने या देने का अधिकार था और उसे ही बच्चों का स्वाभाविक संरक्षक माना जाता है. हिंदू निजी कानून के तहत केवल अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को ही बच्चों को गोद लेने का अधिकार है.

नये कानून में मां को पिता की सहमति से और पिता को मां की सहमति गोद लेने के मामले में समान अधिकार होंगे.

इसके लिये हिंदू गोद लेने और निर्वाह कानून 1956 और संरक्षक और अभिभावक कानून 1890 के कुछ प्रावधानों में बदलाव किया गया है.

इस मामले पर लोकसभा में एक बहस में बोलते हुये विधि एवं न्यायमंत्री वीरप्पा मोइली ने इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया.

इस अवसर श्री मोइली ने कहा कि महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिये व्यापक कानूनी सुधारों की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि नये कानून सामाजिक और लिंग के आधार पर बने पूर्वाग्रहों को समाप्त करने का काम करेंगे.

हालांकि उन्होंने माना कि भारतीय समाज में महिलाओं और पुरुषों की स्थिति और अधिकारों में असमानता बनी हुई है जिसे बदले जाने की जरूरत है.
 
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