उत्तराखण्ड: हाई कोर्ट के फैसले पर रोक, 27 तक राष्ट्रपति शासन हटाने पर भी रोक

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश दीपक मिश्र (बायें) एवं न्यायाधीश शिव कीर्ति सिंह की पीठ ने उत्तराखण्ड में 10 मई को शक्ति परीक्षण का आदेश दिया।

केंद्र सरकार की अपील पर ऐसा होना स्वाभाविक था। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने के मंगलवार के फैसले को फौरी तौर पर रोक दिया है ताकि सभी पक्षों को सर्वोच्च अदालत में सुना जा सके।

इसके साथ ही राज्य में राष्ट्रपति शासन फिर से लागू हो गया है। अहम बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार पर भी 27 अप्रैल को अगली सुनवाई तक वह राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने की रोक भी लगा दी है।

केंद सरकार की ओर से पैरवी कर रहे महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि अभी उन्हें उच्च न्यायालय के फैसले की प्रति नहीं मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को कहा है कि सभी संबंधित पक्षों को फैसले की प्रति उपलब्ध करायी जाये।

खबर ये भी है कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ ने अभी फैसले पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि फैसले की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद ही इस मामले का अध्ययन कर सुनवाई की जा सकेगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ (बायें) और न्यायाधीश वीके बिष्ट के राष्ट्रपति शासन रद्द करने के निर्णय पर रोक लगायी।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ (बायें) और न्यायाधीश वीके बिष्ट के राष्ट्रपति शासन रद्द करने के निर्णय पर रोक लगायी।

गुरुवार को नैनीताल स्थित उत्तराखण्ड हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याची हरीश रावत ने आशंका जतायी थी कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही केंद्र राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाकर नयी सरकार बना सकता है।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने गुरुवार को ही राष्ट्रपति शासन को रद्द करने का निर्णय सुनाया और इसके पहले यह चेतावनी भी दी कि सुनवाई के दौरान नयी सरकार स्थापित करने की कोशिश न्याय का उल्लंघन होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को आदेश दिया है वह 26 अप्रैल तक फैसले का कापी पक्षों को उपलब्ध करवाये। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अपना फैसला उपलब्ध करवाना चाहिये था। हाईकोर्ट ने फ्लोर टेस्ट 29 अप्रैल को करवाने का आदेश दिया था।

जाहिर सी बात है कि इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट को गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला भविष्य में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारों और आचरण के लिये मानक स्थापित करेगा।

जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में 1989 में जनता दल के मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई की सरकार की बर्खास्तगी के मामले में तय किया था।

1994 में एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि बहुमत का फैसला सदन पटल पर ही होगा और उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने के केंद्र सरकार के फैसले की समीक्षा करने और उसे रद्द करने का अधिकार है।

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